राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में भारत को ‘इंडिया’ न कहने की सलाह देकर एक बार फिर देश में एक बहस को जन्म दे दिया है — यह बहस केवल भाषा की नहीं, बल्कि पहचान, संस्कृति और राजनीति की भी है।
एक सार्वजनिक कार्यक्रम में बोलते हुए भागवत ने कहा, "हमारे देश का नाम भारत है। इंडिया नहीं। हमको इसी नाम का प्रयोग करना चाहिए।" उनका यह बयान यूं तो भाषा या नाम के चयन पर प्रतीत होता है, लेकिन इसके पीछे गहरे निहितार्थ छिपे हैं।
RSS लंबे समय से ‘भारत’ शब्द के प्रयोग को प्राथमिकता देता आया है। संघ के विचार में 'भारत' न केवल एक नाम है, बल्कि यह देश की प्राचीन सांस्कृतिक परंपराओं, मूल्यों और आत्मा का प्रतीक है। ‘इंडिया’ शब्द अंग्रेजी शासन की विरासत है, जिसे संघ भारतीयता के मूल स्वरूप से भटका हुआ मानता है।
इस लिहाज से देखा जाए, तो मोहन भागवत की यह सलाह भारतीय सांस्कृतिक चेतना को पुनर्जीवित करने की दिशा में एक प्रयास है — एक ऐसा प्रयास जिसमें भाषा को राष्ट्र की आत्मा से जोड़ा गया है।
कई विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान केवल सांस्कृतिक मुद्दा नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है। 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान विपक्षी गठबंधन ने खुद को INDIA नाम दिया था — Indian National Developmental Inclusive Alliance। तब से 'इंडिया बनाम भारत' की बहस राजनैतिक मोर्चों पर भी गर्म रही है।
ऐसे में संघ प्रमुख का यह वक्तव्य एक संकेत हो सकता है — यह बताने का कि अब समय आ गया है जब भारत की पहचान को विदेशी प्रभावों से पूरी तरह मुक्त किया जाए, भले ही वह भाषा के माध्यम से ही क्यों न हो।