ऑस्ट्रेलिया में सैकड़ों गरीब और बेरोज़गार नागरिक अचानक बिना किसी चेतावनी के अपनी सरकारी आय-सहायता (Income Support) से वंचित हो गए हैं। कारण? — एक स्वचालित सरकारी प्रणाली, जो पात्रता की जाँच बिना मानवीय हस्तक्षेप के कर रही थी।
इस कार्रवाई को कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और विधि विशेषज्ञों ने ‘रोबो-डेब्ट’ घोटाले की भयावह याद दिलाने वाला कदम बताया है।
पीड़ितों की दास्तान — "बिना वजह रोक दी गई हमारी मदद"
कई लाभार्थियों का कहना है कि उन्हें किसी भी तरह की पूछताछ या अपील का मौका नहीं दिया गया। बस एक सरकारी संदेश आया — “आपका भुगतान रोक दिया गया है”।
एक बुजुर्ग महिला ने कहा, “यह रकम मेरे लिए दवा और किराये का एकमात्र सहारा थी। अचानक सब बंद हो गया, और मुझे समझ नहीं आया कि मैंने कौन सी गलती की।”
युवा बेरोज़गारों में भी नाराज़गी है, क्योंकि वे कहते हैं कि सिस्टम ने उनके दस्तावेज़ों की जाँच तक ठीक से नहीं की।
‘रोबो-डेब्ट’ घोटाले की याद
2015 से 2019 के बीच ऑस्ट्रेलिया में चला ‘रोबो-डेब्ट’ कार्यक्रम सरकारी इतिहास के सबसे बड़े कलंकों में से एक माना जाता है। उस समय, एक कंप्यूटर एल्गोरिद्म ने लाखों लोगों को झूठे कर्ज़ के नोटिस भेजे, जिससे मानसिक तनाव, आत्महत्या के मामले और भारी सामाजिक आक्रोश देखने को मिला।
अंततः सरकार को अरबों डॉलर लौटाने पड़े और सार्वजनिक माफ़ी माँगनी पड़ी।
वकील की चेतावनी — "इतिहास मत दोहराइए"
मानवाधिकार कानून विशेषज्ञों ने कहा है कि इस बार भी प्रक्रिया पूरी तरह से गैर-कानूनी है। उनका कहना है कि यदि लेबर सरकार ने इस स्वचालित प्रणाली को तुरंत बंद नहीं किया और प्रभावित लोगों को मुआवज़ा नहीं दिया, तो कानूनी लड़ाई शुरू होगी।
वकील का सख़्त बयान था —
“यह वही गलती है जिसे हम पहले भुगत चुके हैं। अगर सरकार ने अब भी सबक नहीं सीखा, तो ‘रोबो-डेब्ट’ का नया अध्याय लिखने की तैयारी कर रही है।”
सामाजिक संगठनों की माँग
कई सामुदायिक संगठनों और कल्याणकारी समूहों ने सरकार से मांग की है कि—
भुगतान तुरंत बहाल किए जाएँ।
स्वचालित प्रणाली की समीक्षा के लिए स्वतंत्र जांच आयोग बने।
प्रभावित परिवारों को मानसिक व आर्थिक मुआवज़ा दिया जाए।
जनता का सवाल अब सीधा है — “क्या तकनीक की आड़ में सरकार अपने नागरिकों से मानवीय संवेदनाएँ छीन रही है?”