“बिडिंग ब्लाइंड” का खेल: घर बेचने वालों को झांसे में डाल रहे हैं एजेंट, ‘सबसे बड़ा झूठा ही जीतता है सौदा’

“बिडिंग ब्लाइंड” का खेल: घर बेचने वालों को झांसे में डाल रहे हैं एजेंट, ‘सबसे बड़ा झूठा ही जीतता है सौदा’

ऑस्ट्रेलिया के रियल एस्टेट सेक्टर में एक गंदा राज़ उजागर हो रहा है—जिसे अंदरखाने में “बिडिंग ब्लाइंड” कहा जाता है। यह तरीका इतना व्यापक हो चुका है कि कई अनुभवी एजेंट और उद्योग के भीतर के लोग इसे “कॉमन प्रैक्टिस” मानने लगे हैं।

इस चाल में एजेंट विक्रेताओं को वास्तविक बोली और खरीदारों की संख्या से अंधेरे में रखकर सौदे को अपने पक्ष में मोड़ते हैं। मकान बेचने वाले को यह आभास कराया जाता है कि केवल एक या दो कमजोर ऑफ़र हैं, जबकि असलियत में अधिक और बेहतर ऑफ़र मौजूद होते हैं।

कैसे चलता है ‘बिडिंग ब्लाइंड’

  • सूचना रोकना: खरीदारों की ऊँची बोली को विक्रेता तक न पहुँचाना।

  • झूठी प्रतिस्पर्धा दिखाना: नकली या बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए ऑफ़र बताना।

  • जल्दबाज़ी करवाना: विक्रेता पर दबाव डालना कि अभी साइन करो, वरना मौका हाथ से निकल जाएगा।

  • मुनाफ़ा पक्का करना: सौदा तेज़ी से बंद कर एजेंट अपने कमीशन को सुरक्षित कर लेते हैं, चाहे विक्रेता का फायदा हो या नहीं।

एक गुमनाम एजेंट ने बताया, “यहाँ एक कहावत है—‘बिगेस्ट लायर गेट्स द लिस्टिंग’। मतलब, जो विक्रेता को सबसे बड़ी कहानी सुना दे, वही मकान बेचने का अधिकार ले लेता है।”

विक्रेताओं पर असर

ऐसे सौदों में अक्सर विक्रेता को लाखों डॉलर तक का नुकसान हो सकता है। वह अपने मकान की असली बाज़ार क़ीमत से कम पर बेच देता है, यह सोचकर कि यही सबसे अच्छा ऑफ़र है।

उद्योग की प्रतिक्रिया

रियल एस्टेट इंडस्ट्री के कुछ ईमानदार एजेंटों और उपभोक्ता अधिकार संगठनों ने इन प्रथाओं पर कड़ी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि यह न केवल नैतिकता के ख़िलाफ़ है, बल्कि पारदर्शिता और भरोसे को भी खत्म करता है।

ऑस्ट्रेलिया के नियामक निकायों से मांग की जा रही है कि—

  • शिकायत निपटारे के लिए तेज़ और पारदर्शी तंत्र बने।

  • एजेंटों पर सख़्त जुर्माना और लाइसेंस रद्द करने की कार्रवाई हो।

  • सभी ऑफ़र विक्रेता को लिखित और प्रमाण सहित दिखाना अनिवार्य हो।

सरकारी हस्तक्षेप की ज़रूरत

विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर कड़े क़ानून और निगरानी नहीं हुई, तो “बिडिंग ब्लाइंड” जैसी चालें रियल एस्टेट बाजार में सामान्य नियम बन जाएंगी। इससे न केवल विक्रेता, बल्कि खरीदार भी असुरक्षित रहेंगे।