"13 वर्षीय ‘फर्जी प्रोफाइल’ पर ऑनलाइन शिकारियों की बाढ़ — एक खाते पर पाँच गुना ज़्यादा संदेश"

"13 वर्षीय ‘फर्जी प्रोफाइल’ पर ऑनलाइन शिकारियों की बाढ़ — एक खाते पर पाँच गुना ज़्यादा संदेश"

डनी/नई दिल्ली। ऑस्ट्रेलिया में इंटरनेट की दुनिया में छिपे यौन अपराधियों के खतरनाक चेहरे को बेनकाब करने के लिए शोधकर्ताओं ने एक अनोखा प्रयोग किया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स पर 13 वर्षीय लड़कियों के नाम से पूरी तरह फर्जी लेकिन असली जैसे दिखने वाले ‘हनीपॉट’ प्रोफाइल बनाए — यानी ऐसे खाते जो अपराधियों को अपनी ओर खींचने के लिए बनाए जाते हैं।

इन प्रोफाइल्स पर न तो कोई असली बच्चा था, न असली बातचीत, लेकिन तस्वीरें, बायो और शौक इस तरह तैयार किए गए थे कि वे किसी भी सामान्य किशोरी की तरह लगें। इन प्रोफाइल्स के ज़रिए यह जानना था कि किस तरह के अकाउंट्स पर संभावित शिकारी सबसे ज़्यादा सक्रिय होते हैं।

चौंकाने वाला नतीजा
जांच में सामने आया कि एक विशेष प्रोफाइल पर संदिग्ध यौन शिकारियों से मिलने वाले संदेशों की संख्या अन्य प्रोफाइल्स की तुलना में करीब पाँच गुना ज़्यादा थी। संदेश भेजने वालों में ज्यादातर वयस्क पुरुष थे, जो बातचीत को तुरंत निजी चैट में ले जाने और अश्लील विषय छेड़ने की कोशिश कर रहे थे।

शोधकर्ताओं ने बताया कि यह अंतर प्रोफाइल की प्रस्तुति, तस्वीरों की शैली और बायो में दिए गए संकेतों से जुड़ा हो सकता है। यह भी स्पष्ट हुआ कि अपराधी कुछ खास प्रकार के प्रोफाइल्स को जल्दी निशाना बनाते हैं।

बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा पर गंभीर खतरा
बाल सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह खोज माता-पिता और समाज, दोनों के लिए चेतावनी है। ऑनलाइन शिकारी अक्सर सोशल मीडिया पर ऐसे बच्चों को तलाशते हैं, जिनकी प्रोफाइल तस्वीरें और जानकारी उन्हें आसान शिकार के रूप में दिखाती हैं।

विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि—

  • अपने बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट्स की समय-समय पर निगरानी करें।

  • उन्हें सिखाएं कि अजनबियों के संदेशों का जवाब न दें।

  • प्रोफाइल पर व्यक्तिगत जानकारी और पहचान उजागर करने वाली तस्वीरें न डालें।

  • किसी भी संदिग्ध संपर्क की तुरंत रिपोर्ट करें।

‘हनीपॉट’ क्यों और कैसे?
‘हनीपॉट’ प्रोफाइल एक साइबर रिसर्च तकनीक है, जिसमें नकली खाते बनाकर अपराधियों की हरकतों का अध्ययन किया जाता है। यह तरीका कानून प्रवर्तन एजेंसियों और साइबर सुरक्षा शोधकर्ताओं को अपराधियों के पैटर्न और रणनीतियां समझने में मदद करता है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि इंटरनेट पर बच्चों की मौजूदगी अब पहले से कहीं अधिक है, ऐसे में साइबर अपराधियों को रोकने के लिए सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि जागरूकता भी जरूरी है।