एडिलेड/ब्रिसबेन।
ऑस्ट्रेलिया की जानी-मानी सुपरमार्केट चेन ड्रेक्स सुपरमार्केट के निदेशक जे.पी. ड्रेक ने कहा है कि देश में बड़ी संख्या में लोग काम करने से बच रहे हैं, जिसके चलते उन्हें विदेशी श्रमिकों पर निर्भर रहना पड़ रहा है।
ड्रेक ने पूर्व सैनिक सैम बैमफोर्ड के पॉडकास्ट 2 वर्ल्ड्स कोलाइड पर बातचीत के दौरान बताया कि उनकी कंपनी को अपने एडिलेड स्थित डिस्ट्रीब्यूशन सेंटर में वानुअतु से मजदूर बुलाने पड़े हैं। उन्होंने कहा—
“उस इलाके में 23% बेरोजगारी है, फिर भी हमें लोकल लोग काम करने को तैयार नहीं मिलते। वानुअतु से आए लोग शानदार काम कर रहे हैं, उनका टीम स्पिरिट और मेहनत देखने लायक है।”
ड्रेक्स प्रमुख ने कहा कि कंपनी ने कर्मचारियों के लिए जिम, कैंटीन और मुफ्त भोजन जैसी सुविधाएं दी हैं, लेकिन फिर भी स्थानीय लोग आवेदन नहीं करते।
उन्होंने आरोप लगाया कि सेंटरलिंक और अन्य सरकारी भत्तों पर निर्भर कई लोग काम करने की बजाय घर बैठे लाभ उठा रहे हैं।
“जब लोग आसानी से 550 डॉलर हर पखवाड़े पा सकते हैं और थोड़ा बहुत अवैध काम कर लें तो उन्हें नौकरी की ज़रूरत ही नहीं लगती,” उन्होंने कहा।
जे.पी. ड्रेक ने बताया कि यह दिक्कत सिर्फ उनकी कंपनी तक सीमित नहीं है। हाल ही में Perfection Fresh नामक बड़ी कृषि कंपनी का दौरा करने पर उन्होंने पाया कि वहां भी अधिकतर कर्मचारी विदेशी वर्क वीजा पर काम कर रहे हैं।
ड्रेक ने नेशनल डिसएबिलिटी इंश्योरेंस स्कीम (NDIS) पर भी सवाल उठाया, जिसका बजट हाल ही में 46 अरब डॉलर से अधिक हो गया है। उनका कहना है कि “योजना का दुरुपयोग कर लोग बिना वास्तविक पात्रता के लाभ ले रहे हैं और इससे काम करने की प्रवृत्ति कम हो रही है।”
हाल ही में जारी आंकड़ों के अनुसार ऑस्ट्रेलिया की बेरोजगारी दर जुलाई में घटकर 4.2% रह गई है। वहीं, वर्क वीजा धारकों की संख्या 34% बढ़कर 1.1 लाख से अधिक हो गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि विदेशी श्रमिकों की बढ़ती आमद से उत्पादकता और घरेलू रोजगार बाजार पर दबाव बढ़ सकता है।
हालांकि जे.पी. ड्रेक ने ऑस्ट्रेलिया की बहुसांस्कृतिक पहचान का समर्थन किया, लेकिन उन्होंने माना कि बढ़ते विदेशी श्रमिकों और सामाजिक तनावों पर संतुलित चर्चा ज़रूरी है।
👉 कुल मिलाकर, सुपरमार्केट चेन के इस बयान ने उस बहस को और तेज़ कर दिया है कि क्या सरकारी भत्ते काम करने की इच्छा को कम कर रहे हैं और क्या ऑस्ट्रेलिया का श्रम बाज़ार विदेशी मजदूरों पर ज़रूरत से ज़्यादा निर्भर होता जा रहा है।