ऑस्ट्रेलिया में बच्चों को निगल रही डिमेंशिया की त्रासदी

ऑस्ट्रेलिया में बच्चों को निगल रही डिमेंशिया की त्रासदी

सिडनी, 17 सितम्बर।
हर तीन दिन में एक ऑस्ट्रेलियाई शिशु का जन्म ऐसे दुर्लभ आनुवांशिक रोग के साथ होता है जिसे चाइल्डहुड डिमेंशिया कहा जाता है। हैरानी की बात यह है कि इनमें से आधे बच्चे 10 साल की उम्र तक भी नहीं जी पाते और करीब तीन-चौथाई वयस्कता तक पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देते हैं। विशेषज्ञों ने इसे एक राष्ट्रीय स्वास्थ्य संकट बताते हुए त्वरित सरकारी कदम की मांग की है।


लक्षण और पीड़ा

मर्डोक चिल्ड्रन्स रिसर्च इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर जॉन क्रिस्टोडूलू बताते हैं कि इन बच्चों में वयस्क डिमेंशिया जैसी ही समस्याएँ दिखती हैं—याददाश्त का खोना, भ्रम, समझने और बोलने में कठिनाई। लेकिन इसके साथ ही यह रोग बच्चों को और भी भयावह रूप में जकड़ता है—दौरे पड़ना, दृष्टि व सुनने की क्षमता खोना, चलने-फिरने की शक्ति समाप्त होना और गंभीर मानसिक तनाव इनका हिस्सा बन जाते हैं।

“किसी भी परिवार के लिए सबसे कठिन होता है अपने बच्चे की बीमारी का कारण जानना। कई बार वर्षों की जांच-पड़ताल के बाद ही असली कारण पता चलता है,” वे कहते हैं।


आंकड़े और तुलना

2024 के आँकड़े बताते हैं कि ऑस्ट्रेलिया में 14 वर्ष से कम उम्र के 894 बच्चे चाइल्डहुड डिमेंशिया से पीड़ित थे, जबकि 1223 बच्चे कैंसर से जूझ रहे थे। लेकिन फर्क यह है कि जहाँ कैंसर से जूझ रहे बच्चों में 80 प्रतिशत से अधिक अब ठीक हो जाते हैं, वहीं डिमेंशिया पीड़ित बच्चों की स्थिति दशकों से जस की तस बनी हुई है।

कैंसर अनुसंधान पर सरकार का निवेश पाँच से दस गुना अधिक है, जबकि डिमेंशिया से मरने वाले बच्चों की संख्या अब कैंसर जितनी ही है।


बदलाव की माँग

चाइल्डहुड डिमेंशिया इनिशिएटिव की सीईओ मेगन माक आज विश्व चाइल्डहुड डिमेंशिया दिवस पर राष्ट्रीय स्तर पर नेशनल चाइल्डहुड डिमेंशिया यूनिट (NCDU) बनाने की माँग कर रही हैं।

इस इकाई में चार प्रमुख हिस्से होंगे—

  • देखभाल का मॉडल

  • राष्ट्रीय संदर्भ केंद्र

  • थैरेपी एक्सेस हब

  • रोगी डेटा समाधान

आर्थिक आकलन के अनुसार, पाँच वर्षों में 12.64 मिलियन डॉलर का निवेश करीब 61.49 मिलियन डॉलर के लाभ देगा। यानी हर खर्च किए गए एक डॉलर पर करीब पाँच डॉलर की वापसी।

मेगन माक का कहना है, “यह फंडिंग की गुहार नहीं, बल्कि एक निवेश का अवसर है। अगर अभी कदम उठाए जाएं तो हजारों बच्चों और परिवारों का भविष्य बदला जा सकता है।”