ऑस्ट्रेलियाई समाज में अकेलापन, बढ़ते टैक्स और अधूरे सपनों की तस्वीर

मेलबर्न इंस्टीट्यूट की 2025 रिपोर्ट से चौंकाने वाले खुलासे

ऑस्ट्रेलियाई समाज में अकेलापन, बढ़ते टैक्स और अधूरे सपनों की तस्वीर

मेलबर्न, 20 सितम्बर 2025 — मेलबर्न इंस्टीट्यूट द्वारा जारी वार्षिक हाउसहोल्ड, इनकम एंड लेबर डायनेमिक्स इन ऑस्ट्रेलिया (HILDA) सर्वे ने एक गंभीर चेतावनी दी है। इस सर्वे के अनुसार ऑस्ट्रेलिया में लोग आज पहले से कहीं ज्यादा अकेले हैं, उनका सामाजिक दायरा घट रहा है, टैक्स का बोझ बढ़ता जा रहा है और जीवन के अहम फैसले – चाहे बच्चे पैदा करना हो या रिटायरमेंट लेना – लगातार टाले जा रहे हैं।


घटते रिश्ते और तन्हाई की बढ़ती दीवार

रिपोर्ट बताती है कि सामाजिक रिश्तों में गिरावट लगातार बढ़ रही है।

  • साल 2001 में जहां 32 प्रतिशत लोग हफ्ते में कई बार दोस्तों या रिश्तेदारों से मिलते थे, अब यह संख्या सिर्फ 20 प्रतिशत रह गई है।

  • कोविड-19 महामारी ने इस दूरी को और गहरा कर दिया है।

रिपोर्ट की सह-लेखिका डॉ. इंगा लैस के मुताबिक, “न सिर्फ हमारे दोस्त कम हुए हैं, बल्कि हम पहले के मुकाबले अब कहीं कम मेलजोल करते हैं।”

इसके असर मानसिक और शारीरिक दोनों स्तरों पर दिख रहे हैं। सर्वे में पाया गया कि अधिकतर लोग अब लगातार शारीरिक दर्द से भी जूझ रहे हैं। खासतौर पर कम आय वाले घरों में यह समस्या कहीं ज्यादा गंभीर है। डॉ. फर्डी बोथा ने कहा, “जितनी कम आय होगी, उतना ज्यादा दर्द झेलना पड़ रहा है।”


टैक्स बोझ और महंगाई की मार

रिपोर्ट में बताया गया कि 2001 से अब तक की तुलना में ऑस्ट्रेलियाई लोग आज सबसे ऊंचा औसत आयकर दर चुका रहे हैं।

  • इसका मुख्य कारण है ब्रैकेट क्रीप। जैसे-जैसे महंगाई के चलते वेतन बढ़ा, वैसे-वैसे लोग ऊंची टैक्स श्रेणियों में चले गए।

  • इस वजह से वास्तविक आय घट गई है और लोगों की क्रयशक्ति कम हो गई है।

प्रोफेसर रोजर विल्किन्स का कहना है कि वेतन वृद्धि सामान्यतः अच्छी बात मानी जाती है, लेकिन जब टैक्स की दर बढ़ जाए और दाम तेज़ी से ऊपर जाएं तो असल में जीवन स्तर गिरने लगता है।

रिपोर्ट यह भी दिखाती है कि

  • 2021 तक लोग अपनी आय का अपेक्षाकृत कम हिस्सा जरूरी चीज़ों पर खर्च करते थे।

  • लेकिन 2023 तक आते-आते ज़रूरतों पर खर्च का अनुपात 4.5% बढ़ गया।

यानी लोग अब पहले से ज्यादा अपनी आमदनी सिर्फ खाने-पीने और आवश्यक चीज़ों पर खर्च कर रहे हैं।


परिवार और बच्चों पर आर्थिक दबाव

बढ़ते खर्च और आर्थिक अनिश्चितता का असर लोगों की परिवार नियोजन पर भी पड़ा है।

  • पहली बार ऐसा हुआ है कि पुरुषों की औसत इच्छित संतान संख्या दो से कम हो गई है।

  • अधिक लोग अब केवल एक बच्चा या फिर बिल्कुल भी संतान न चाहने की सोच रखते हैं।

डॉ. लैस का कहना है कि संभावित माता-पिता बच्चों के पालन-पोषण और भविष्य की आर्थिक सुरक्षा को लेकर पहले से ज्यादा चिंतित हैं।


रिटायरमेंट अब दूर का सपना

जहां कभी 60 की उम्र रिटायरमेंट का प्रतीक मानी जाती थी, वहीं अब तस्वीर बदल चुकी है।

  • 2003 में 60–64 आयु वर्ग की 70% महिलाएं सेवानिवृत्त थीं, लेकिन 2023 में यह घटकर केवल 41% रह गईं।

  • पुरुषों में यह दर 49% से घटकर 27% तक गिर गई।

सिर्फ काम करने की इच्छा ही वजह नहीं है, बल्कि मजबूरी भी है।

  • बीते 20 सालों में किराए पर रहने वाले बुजुर्गों की संख्या दोगुनी हो गई है।

  • औसत वार्षिक किराया 37% बढ़ गया है।

डॉ. काइल पेटन ने चेतावनी दी कि, “सुपरऐन्यूएशन (पेंशन फंड) अकेले अगली पीढ़ी को सुरक्षित जीवन नहीं दे पाएगा, खासकर तब जब वे घर के मालिक बनने से वंचित रह रहे हों।”


निष्कर्ष: एक चिंताजनक तस्वीर

यह रिपोर्ट ऑस्ट्रेलियाई समाज में गहराती चुनौतियों को सामने लाती है।

  • अकेलापन बढ़ रहा है,

  • टैक्स और महंगाई से जेब खाली हो रही है,

  • बच्चे पैदा करने का निर्णय कठिन होता जा रहा है,

  • और रिटायरमेंट एक दूर का सपना बन चुका है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नीतिगत स्तर पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियाँ आर्थिक सुरक्षा और सामाजिक संतुलन दोनों से और दूर होती जाएँगी।