बिहार-नेपाल सीमा क्षेत्र से सटे जिलों में चल रहे अवैध मदरसों को लेकर एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। खुफिया एजेंसियों और स्थानीय प्रशासन की जांच में यह सामने आया है कि इन मदरसों का संचालन संदिग्ध स्रोतों से आने वाले हवाला के पैसों से हो रहा है, और इनमें जिहादी विचारधारा की पढ़ाई कराई जा रही है। साथ ही, इनमें बांग्लादेशी घुसपैठियों को भी अवैध रूप से दाखिला दिया जा रहा है।
रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार-नेपाल सीमा पर मौजूद सीमावर्ती जिलों — खासकर सीतामढ़ी, मधुबनी, सुपौल, किशनगंज और अररिया — में करीब 145 से अधिक अवैध मदरसों की पहचान हुई है। इनमें से अधिकांश मदरसों का न तो कोई वैध पंजीकरण है, न ही इनकी पढ़ाई या पाठ्यक्रम पर सरकारी निगरानी है।
जांच एजेंसियों का मानना है कि इन मदरसों को हवाला के जरिए विदेशों से फंडिंग हो रही है। खासकर खाड़ी देशों और बांग्लादेश के कुछ इस्लामी संगठनों से पैसा भेजा जा रहा है, जिसका उपयोग जिहादी विचारधारा फैलाने और धार्मिक उन्माद को बढ़ावा देने में किया जा रहा है। कई मामलों में इन संस्थानों का संबंध प्रतिबंधित संगठनों से भी पाया गया है।
खुफिया जानकारी के अनुसार, इन मदरसों में बड़ी संख्या में बांग्लादेशी युवाओं को दाखिला दिया जा रहा है, जिनके पास वैध दस्तावेज नहीं हैं। यह न सिर्फ भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है, बल्कि जनसंख्या संतुलन, स्थानीय व्यवस्था और सामाजिक समरसता के लिए भी चिंता का विषय बनता जा रहा है।
राज्य सरकार और खुफिया एजेंसियां अब इस मसले को गंभीरता से ले रही हैं। सीमावर्ती क्षेत्रों में तलाशी अभियान तेज किए गए हैं, और कई संदिग्ध मदरसों को बंद भी किया जा चुका है। इसके साथ ही, इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों से सतर्क रहने और संदिग्ध गतिविधियों की सूचना देने की अपील की गई है।
हिन्दू संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस खुलासे के बाद गहरी चिंता जताई है। उनका कहना है कि ऐसे मदरसों की वजह से सीमावर्ती क्षेत्रों में कट्टरता बढ़ रही है और यह देश की अखंडता के लिए खतरा बन सकता है। वे सरकार से सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।