सियोल/बीजिंग, 24 जून 2025
वैश्विक संकटों की आड़ में चीन ने अपने पड़ोसियों की समुद्री सीमाओं में दखल देना शुरू कर दिया है। ताजा घटनाक्रम में उपग्रह तस्वीरों से खुलासा हुआ है कि चीन ने पीले सागर (Yellow Sea) में एक विशाल गहरे समुद्र में स्थित मंच (deep-sea platform) खड़ा कर दिया है, जो विवादित जल क्षेत्र में आता है। यह इलाका फिलहाल संयुक्त रूप से साझा किए जाने वाले क्षेत्र में आता है, जहां संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून (UNCLOS) के तहत अंतिम निर्णय लंबित है।
बीजिंग इस मंच को मछली पालन (aquaculture) केंद्र बता रहा है, लेकिन दक्षिण कोरिया को इसकी मंशा पर गंभीर शक है। दक्षिण कोरिया के महासागर और मत्स्य पालन मंत्री कांग डो-ह्युंग ने इस मुद्दे को लेकर कहा, “हम इस मामले को अपनी समुद्री संप्रभुता की रक्षा के दृष्टिकोण से अत्यंत गंभीरता से ले रहे हैं।” अप्रैल में दोनों देशों के बीच समुद्र में टकराव की स्थिति भी उत्पन्न हो चुकी है।
संभव है दोहरे इस्तेमाल वाला ढांचा:
एशिया समुद्री पारदर्शिता पहल (Asia Maritime Transparency Initiative - AMTI) की रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि यह मंच मछली पालन के साथ-साथ सैन्य उद्देश्यों के लिए भी इस्तेमाल हो सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, “हालांकि उपलब्ध जानकारी से पता चलता है कि मंच वास्तव में जलीय कृषि पर केंद्रित हैं, लेकिन चीन के इतिहास को देखते हुए दोहरे इस्तेमाल की संभावना को नकारा नहीं जा सकता।”
दक्षिण चीन सागर की पुनरावृत्ति?
2015 में चीन ने स्प्रैटली द्वीपों (Spratly Islands) पर निर्माण कार्य को ‘मौसम स्टेशन’ और ‘समुद्री बचाव केंद्र’ बताकर शुरू किया था, लेकिन बाद में वहीं पर मिसाइल लॉन्चर्स, पनडुब्बी विरोधी हथियार, युद्धक विमान हैंगर, गोला-बारूद बंकर और सैन्य छावनी स्थापित कर दी गईं।
अब ऐसा ही एक कदम पीले सागर में उठाकर चीन ने फिर से पड़ोसी देशों की चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि बीजिंग मौजूदा वैश्विक संकटों – जैसे यूक्रेन युद्ध, गाजा संघर्ष और ईरान-इजराइल टकराव – का फायदा उठाकर अपनी विस्तारवादी नीति को आगे बढ़ा रहा है।
समाप्त हुआ आपसी समझौता?
पीले सागर में स्थित यह विवादित जलक्षेत्र चीन और दक्षिण कोरिया द्वारा एक साझा क्षेत्र के रूप में उपयोग किया जाता रहा है, जब तक कि संयुक्त राष्ट्र मध्यस्थता से इसका फैसला नहीं हो जाता। लेकिन अब ऐसा प्रतीत होता है कि बीजिंग ने उस समझौते को दरकिनार कर दिया है।
निष्कर्ष:
चीन की यह नई रणनीति केवल दक्षिण कोरिया ही नहीं, बल्कि समूचे एशिया-प्रशांत क्षेत्र के लिए चेतावनी है। अगर इसे समय रहते नहीं रोका गया, तो यह दक्षिण चीन सागर जैसी स्थिति का विस्तार हो सकता है, जहां चीन पहले ही अंतरराष्ट्रीय नियमों को चुनौती देकर सैन्य निर्माण कर चुका है।