चीन-रूस गठजोड़: ऑस्ट्रेलिया के लिए नई भू-राजनीतिक चुनौती

चीन-रूस गठजोड़: ऑस्ट्रेलिया के लिए नई भू-राजनीतिक चुनौती

इंडो-पैसिफिक क्षेत्र एक बार फिर वैश्विक राजनीति का केंद्र बन गया है। चीन और रूस के बीच लगातार बढ़ती निकटता न केवल अमेरिका बल्कि ऑस्ट्रेलिया के लिए भी गंभीर रणनीतिक और सुरक्षा संबंधी चिंताएं खड़ी कर रही है।

बीजिंग में शक्ति प्रदर्शन

बीजिंग के तियानआनमेन चौक पर आयोजित विशाल सैन्य परेड में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने दुनिया को स्पष्ट संदेश दिया। मंच पर उनके साथ रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और उत्तर कोरिया के सर्वोच्च नेता किम जोंग-उन भी मौजूद रहे।
इस परेड को चीन ने द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति की 80वीं वर्षगांठ के रूप में प्रस्तुत किया, लेकिन असली संदेश चीन की सैन्य क्षमता और वैश्विक ताकत दिखाना था।

नई डोंगफेंग-5 अंतरमहाद्वीपीय परमाणु मिसाइलों की कतारें इस बात का संकेत थीं कि चीन किसी भी परिस्थिति—शांति हो या युद्ध—के लिए पूरी तरह तैयार है।

शी जिनपिंग ने अपने भाषण में कहा, “आज मानवता शांति या युद्ध, संवाद या टकराव, और साझा जीत या शून्य-योग खेल के बीच चुनाव करने के मोड़ पर खड़ी है।”

ऑस्ट्रेलिया की चिंता

ऑस्ट्रेलिया लंबे समय से अमेरिका का रणनीतिक साझेदार रहा है। चीन की बढ़ती सैन्य मौजूदगी और आक्रामक रुख के बीच ऑस्ट्रेलिया को अपने भविष्य को लेकर गंभीर चिंताएं हैं।
रक्षा उद्योग और प्रशांत मामलों के मंत्री पैट कॉनरॉय ने कहा, “हम एक ऐसे दौर से गुजर रहे हैं, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सबसे बड़ी चुनौती है। चीन जैसे शक्तिशाली देश का उभार और उसका प्रभाव हमारे लिए अभूतपूर्व परिस्थिति पैदा कर रहा है।”

कॉनरॉय ने स्पष्ट किया कि ऑस्ट्रेलिया न केवल अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रहा है बल्कि प्रशांत द्वीप देशों के साथ संबंध मजबूत कर क्षेत्र में चीन के प्रभाव को सीमित करने की रणनीति पर भी काम कर रहा है।

‘इंडो-पैसिफिक’ की अवधारणा पर मतभेद

ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी की शोधकर्ता डिलनोज़ा उबायदुल्लाएवा के अनुसार चीन और उसके सहयोगी देशों को ‘इंडो-पैसिफिक’ की अवधारणा स्वीकार्य ही नहीं है।
वे अब भी “एशिया-प्रशांत” शब्द का प्रयोग करते हैं और मानते हैं कि इंडो-पैसिफिक पश्चिमी देशों की बनाई हुई परिभाषा है, जिसका मकसद चीन और रूस जैसे देशों को अलग-थलग करना है।

इस मतभेद से यह साफ हो जाता है कि केवल सैन्य या कूटनीतिक स्तर पर ही नहीं, बल्कि भाषाई और वैचारिक स्तर पर भी संघर्ष जारी है।

रूस और चीन की साझेदारी

रूस और चीन की नजदीकी ऑस्ट्रेलिया के लिए इसलिए भी चिंता का विषय है क्योंकि दोनों देश सुरक्षा परिषद में वीटो शक्ति रखते हैं और कई मुद्दों पर पश्चिमी देशों के खिलाफ साझा रुख अपनाते हैं।
साथ ही, दोनों देश मध्य एशिया और प्रशांत क्षेत्र में अपने प्रभाव को लगातार बढ़ा रहे हैं।

निष्कर्ष

ऑस्ट्रेलिया खुद को एक कठिन स्थिति में पाता है। एक तरफ वह अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगियों का प्रमुख रणनीतिक भागीदार है, दूसरी तरफ उसका सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार चीन है।
लेकिन चीन-रूस की साझेदारी और उसका इंडो-पैसिफिक पर असर यह दर्शाता है कि आने वाले वर्षों में कैनबरा को सैन्य, कूटनीति और अर्थव्यवस्था तीनों मोर्चों पर संतुलन साधने की कड़ी परीक्षा से गुजरना होगा।