काबुल में पाकिस्तान-चीन-अफगान त्रिपक्षीय बैठक, भारत क्यों रहे चौकन्ना?

काबुल में पाकिस्तान-चीन-अफगान त्रिपक्षीय बैठक, भारत क्यों रहे चौकन्ना?

अफगानिस्तान की राजधानी काबुल बुधवार को बड़ी राजनयिक हलचल का गवाह बनी। चीन के विदेश मंत्री वांग यी, पाकिस्तान के विदेश मंत्री और तालिबान सरकार के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी एक साथ बैठक की मेज़ पर बैठे। यह त्रिपक्षीय वार्ता राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा सहयोग को गहराई देने के लिए आयोजित की गई।

बैठक के प्रमुख मुद्दे

इस बैठक में तीन मुख्य बिंदुओं पर चर्चा हुई—

  1. आतंकवाद विरोधी सहयोग : पाकिस्तान ने अफगानिस्तान से अपनी ज़मीन पर सक्रिय आतंकी संगठनों पर कार्रवाई की मांग दोहराई। चीन ने इस पर सामूहिक सुरक्षा सहयोग का समर्थन किया।

  2. CPEC का विस्तार : चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) को अफगानिस्तान तक ले जाने की योजना पर गंभीर विचार हुआ। बीजिंग का मकसद इसे अपनी महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) से जोड़ना है।

  3. राजनयिक संबंधों का सुधार : मई में बीजिंग में हुई पिछली बैठक की तर्ज़ पर, तीनों देशों ने राजनयिक स्तर पर सहयोग और संपर्क बढ़ाने पर सहमति जताई।

चीन और पाकिस्तान का मकसद

चीन इस त्रिपक्षीय तंत्र के ज़रिये अफगानिस्तान को आर्थिक निवेश और बुनियादी ढाँचे की परियोजनाओं से जोड़ना चाहता है। पाकिस्तान के लिए यह बैठक दोहरी अहमियत रखती है—एक ओर सुरक्षा चिंताओं का समाधान और दूसरी ओर अफगानिस्तान के साथ आर्थिक तालमेल।

भारत क्यों चिंतित?

भारत के लिए यह बैठक कई वजहों से अहम है:

  • रणनीतिक दबाव : CPEC का अफगानिस्तान तक विस्तार भारत के लिए चिंता का विषय है। यह प्रोजेक्ट पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरता है, जिसका भारत कड़ा विरोध करता है।

  • चीन की बढ़ती मौजूदगी : अगर अफगानिस्तान चीन-प्रेरित ढांचे से जुड़ता है, तो दक्षिण एशिया में बीजिंग की पकड़ और मज़बूत होगी।

  • भारत-तालिबान बातचीत के बाद का समीकरण : हाल ही में भारत के विदेश मंत्री और अफगान विदेश मंत्री के बीच हुई बातचीत से नई संभावनाएं बनी थीं। लेकिन चीन की इस सक्रियता से भारत की कोशिशों को चुनौती मिल सकती है।

आगे का रास्ता

विशेषज्ञ मानते हैं कि इस बैठक से तीनों देशों के बीच नज़दीकी बढ़ेगी और चीन एक “मध्यस्थ” की भूमिका में और मज़बूत होगा। दूसरी ओर भारत को अब अपनी अफगान नीति को और संतुलित व सक्रिय बनाने की ज़रूरत होगी, ताकि क्षेत्रीय हितों की रक्षा की जा सके।