पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में आतंकवाद का एक नया और बेहद खतरनाक अध्याय खुल गया है। खुफिया सूत्रों के अनुसार, लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत (ISIS-K) के बीच एक औपचारिक गठबंधन बन चुका है — जिसे पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई की सीधी देखरेख में अंजाम दिया जा रहा है। इस साझेदारी का मकसद बलूच विद्रोहियों और तालिबान के विरोधी गुटों के खिलाफ एक संयुक्त अभियान चलाना है।
बलूचिस्तान से मिली एक ताज़ा तस्वीर ने खुफिया एजेंसियों की नींद उड़ा दी है — इसमें ISIS-K के कॉर्डिनेटर मीर शफीक मेंगल को लश्कर-ए-तैयबा के वरिष्ठ कमांडर राना मोहम्मद अशफाक को हथियार सौंपते हुए देखा गया है। यह वही मेंगल हैं जो बलूचिस्तान के पूर्व कार्यवाहक मुख्यमंत्री नासिर मेंगल के बेटे हैं और लंबे समय से आईएसआई के लिए ‘मोहरा’ की भूमिका निभा रहे हैं।
जानकारों के मुताबिक, यह गठबंधन आईएसआई की उस नई रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत विभिन्न चरमपंथी गुटों को एक “राज्य-प्रायोजित जिहादी नेटवर्क” में जोड़ा जा रहा है। उद्देश्य है — बलूच अलगाववादी आंदोलनों को कुचलना और अफगान सीमा पर इस्लामाबाद के नियंत्रण को मज़बूत करना।
ISIS-K की प्रचार पत्रिका यलगार में हाल ही में छपी रिपोर्ट में दावा किया गया है कि संगठन अब कश्मीर में अपनी गतिविधियों का विस्तार करेगा। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम आईएसआई के सहयोग के बिना संभव नहीं है।
दरअसल, पाकिस्तान लश्कर-ए-तैयबा के लॉजिस्टिकल नेटवर्क और स्थानीय ढांचे का इस्तेमाल ISIS-K को ताकत देने के लिए कर रहा है — ताकि भारत-नियंत्रित जम्मू-कश्मीर में आतंक की नई लहर खड़ी की जा सके।
सूत्रों के अनुसार, जून 2025 में LeT प्रमुख राना अशफाक और उनके उप-प्रमुख सैफुल्ला कसूरी ने एक गुप्त बैठक (जिगरा) में बलूच विद्रोहियों के खिलाफ जिहाद की घोषणा की थी। यह उसी समय की बात है जब मार्च 2025 में बलूच लड़ाकों ने ISIS-K के मस्तंग ठिकाने पर हमला कर लगभग 30 आतंकियों को मार गिराया था। इसके बाद आईएसआई ने लश्कर को हस्तक्षेप करने का आदेश दिया था।
क्वेटा में मरकज-ए-तकवा नामक केंद्र से LeT का एक पुराना नेटवर्क भी सक्रिय है। यही केंद्र 2000 के दशक में उस प्रशिक्षण शिविर का संचालन करता था जहां इंडियन मुजाहिदीन के संस्थापक यासीन भटकल को प्रशिक्षण मिला था।
विशेषज्ञों के मुताबिक, लश्कर-ISIS-K गठबंधन पाकिस्तान के आतंकी पारिस्थितिकी तंत्र में एक गंभीर वैचारिक बदलाव का संकेत है। वैचारिक रूप से विरोधी गुट अब आईएसआई के संरक्षण में एकजुट हो रहे हैं।
यह गठबंधन सिर्फ बलूचिस्तान या अफगानिस्तान के लिए ही नहीं, बल्कि भारत के लिए भी नई सुरक्षा चुनौती बन सकता है — खासकर कश्मीर घाटी में।
भारतीय सुरक्षा एजेंसियां इस घटनाक्रम पर बारीकी से नज़र रखे हुए हैं। यह स्थिति उस दौर की याद दिलाती है जब अफगान जिहाद के समय लश्कर ने अल-कायदा के साथ सीमित साझेदारी की थी।
अब इतिहास खुद को दोहराता नज़र आ रहा है — लेकिन इस बार, ISIS-K और आईएसआई की मिलीभगत के साथ।