मेलबर्न, जो कभी दुनिया का सबसे सुरक्षित और रहने योग्य शहर कहलाता था, अब अपराध और असुरक्षा की चर्चाओं में घिरा हुआ है। बढ़ते अपराध और आम लोगों की चिंताओं के बीच नगर परिषद ने सुरक्षा इंतज़ामों के लिए 4.5 मिलियन डॉलर का बजट स्वीकृत किया है।
शहर में हाल के दिनों में सड़क पर हिंसा, चोरी और नशे से जुड़ी घटनाओं में इज़ाफा हुआ है। पुलिस रिकॉर्ड बताते हैं कि कई मामलों में पीड़ित वे ही लोग हैं जो समाज के हाशिए पर खड़े समुदायों से आते हैं। इसीलिए परिषद का मानना है कि अतिरिक्त सुरक्षा उपाय जरूरी हैं, ताकि आम लोगों का भरोसा वापस लौटे।
हालांकि, सुरक्षा विशेषज्ञों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस योजना पर सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि यादृच्छिक तलाशी (random searches) अक्सर प्रवासी, आदिवासी और गरीब वर्गों को निशाना बनाती है। आलोचकों का तर्क है कि इससे इन समुदायों में असुरक्षा और बढ़ेगी।
परिषद के भीतर और बाहर कई लोग यह भी मानते हैं कि हमें “दयालुता” या “सहानुभूति” के नाम पर सुरक्षा उपायों से समझौता नहीं करना चाहिए। उनका कहना है कि नज़रअंदाज़ करने की प्रवृत्ति से सबसे ज़्यादा नुकसान उन्हीं को हो रहा है जिन्हें हम बचाने की कोशिश कर रहे हैं। यानी हाशिए पर रहने वाले समुदाय अपराध के सबसे बड़े शिकार बनते जा रहे हैं।
कभी दुनिया का “सबसे रहने योग्य शहर” कहलाने वाला मेलबर्न अब आलोचकों की नज़र में “गॉथम सिटी” जैसी छवि हासिल कर रहा है – जहाँ लोग डर और अपराध की कहानियाँ सुनाते हैं। शहरवासियों का कहना है कि प्रशासन को अब केवल दिखावे के बजाय वास्तविक सुरक्षा पर ध्यान देना होगा।