नई दिल्ली। इस साल भारत में डाटा उल्लंघनों (Data Breaches) के कारण कंपनियों और संस्थानों को भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा है। आईबीएम की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में यह नुकसान 13% बढ़कर औसतन 22 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, जो दुनिया में सबसे अधिक है। पिछले वर्ष यह औसत लागत 19.5 करोड़ रुपये थी।
रिपोर्ट में कहा गया है कि लागत में लगातार वृद्धि के बावजूद, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के इस्तेमाल में सुरक्षा और गवर्नेंस के मामले में गंभीर कमी बनी हुई है। डाटा चोरी के सबसे आम तरीकों में फिशिंग और धोखाधड़ी वाले संचार भेजना शामिल है, जिसका इस्तेमाल 18% मामलों में हुआ। वहीं, तीसरे पक्ष के वेंडर या आपूर्ति शृंखला से जुड़े उल्लंघन 17% मामलों में सामने आए।
आईबीएम इंडिया और दक्षिण एशिया के प्रौद्योगिकी उपाध्यक्ष विश्वनाथ रामास्वामी ने कहा,
"एआई तेज़ी से व्यापारिक प्रक्रियाओं में शामिल हो रहा है, लेकिन सुरक्षा और गवर्नेंस पीछे रह गए हैं। एक्सेस कंट्रोल और एआई गवर्नेंस टूल्स का अभाव केवल तकनीकी चूक नहीं, बल्कि एक रणनीतिक कमजोरी है।"
आईबीएम बीते दो दशकों से डाटा उल्लंघन की लागत पर रिपोर्ट तैयार कर रही है और इस दौरान लगभग 6,500 घटनाओं का विश्लेषण किया गया है।
कौन-सा क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित?
भारत में अनुसंधान क्षेत्र को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ, जहां औसत लागत 28.9 करोड़ रुपये तक पहुंची। इसके बाद परिवहन उद्योग में 28.8 करोड़ रुपये और औद्योगिक क्षेत्र में 26.4 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।
एआई नीति की कमी
रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ कि डाटा चोरी का शिकार हुए 60% संगठनों के पास एआई गवर्नेंस नीति (AI Governance Policy) नहीं थी। संगठन बिना नीति बनाए एआई अपना रहे हैं, जिससे सुरक्षा जोखिम बढ़ रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे डिजिटल तकनीक और एआई का इस्तेमाल बढ़ रहा है, वैसे-वैसे डाटा सुरक्षा में निवेश और सख्त नियमों की जरूरत भी पहले से कहीं ज्यादा हो गई है।