अमेरिका और भारत के रिश्तों में हालिया तनाव ने चीन और भारत के बीच नजदीकियां बढ़ाने का रास्ता खोल दिया है। ट्रंप प्रशासन द्वारा रूसी तेल आयात का हवाला देते हुए भारतीय वस्तुओं पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाने के बाद से वाशिंगटन और नई दिल्ली के बीच विश्वास में दरार आई है। यह दरार सुरक्षा और प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में वर्षों से बने सहयोग को प्रभावित कर सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत-अमेरिका के बिगड़ते रिश्ते बीजिंग के लिए फायदे का सौदा साबित हो सकते हैं। तक्षशिला संस्थान, बेंगलुरु के हिंद-प्रशांत अध्ययन प्रमुख मनोज केवलरमानी का कहना है कि "नई दिल्ली और वाशिंगटन के बीच राजनीतिक विश्वास का टूटना निश्चित रूप से चीन के पक्ष में काम करता है।"
भारत और चीन के बीच यह नजदीकी पिछले साल अक्टूबर में रूस के कजान में हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से शुरू हुई थी, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने मुलाकात की थी। इसके बाद से दोनों देशों के बीच आधिकारिक यात्राओं में बढ़ोतरी हुई है। व्यापार बाधाओं को कम करने और नागरिकों की आवाजाही को सरल बनाने पर भी बातचीत जारी है।
हालांकि सहयोग की नई संभावनाओं के बावजूद भारत और चीन के रिश्तों में कई बाधाएं कायम हैं। इनमें 2,100 मील लंबी सीमा पर नियंत्रण का मुद्दा, पाकिस्तान के साथ चीन की करीबी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को आकर्षित करने की भारत की कोशिशें शामिल हैं। भारत लगातार यह प्रयास कर रहा है कि कंपनियां चीन पर निर्भरता घटाकर नई दिल्ली में निवेश करें।
कुल मिलाकर, अमेरिका की सख्त व्यापार नीतियों ने भारत और चीन के बीच संवाद की नई राह खोली है। हालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि यह निकटता स्थायी बनेगी या नहीं, लेकिन फिलहाल बीजिंग और नई दिल्ली दोनों के लिए यह संबंध रणनीतिक दृष्टि से लाभकारी हो सकते हैं।