नई दिल्ली – मध्य पूर्व में ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव और सैन्य टकराव के बीच भारत की विदेश नीति एक बार फिर वैश्विक संतुलन का उदाहरण बन गई है। भारत, जो दशकों से ईरान और इजरायल दोनों के साथ मजबूत लेकिन अलग-अलग क्षेत्रों में साझेदारी निभाता रहा है, इस संघर्ष में अब तक संयम और कूटनीति का रास्ता अपना रहा है।
भारत और ईरान के संबंध ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और रणनीतिक आधार पर दशकों पुराने हैं। भारत चाबहार बंदरगाह परियोजना में बड़ी भूमिका निभा रहा है, जो अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक व्यापारिक पहुंच के लिए अहम है। इसके अलावा, भारत ईरान से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल भी आयात करता रहा है, हालांकि अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते हाल के वर्षों में इसमें गिरावट आई है।
वहीं दूसरी ओर, इजरायल के साथ भारत के संबंध पिछले दो दशकों में रक्षा, साइबर सुरक्षा, कृषि और जल तकनीक जैसे क्षेत्रों में अभूतपूर्व रूप से प्रगाढ़ हुए हैं। इजरायली हथियार प्रणाली और निगरानी तकनीक भारतीय सशस्त्र बलों के लिए महत्त्वपूर्ण बन चुकी हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इजरायल के नेताओं के बीच मित्रवत रिश्ते दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत बनाते हैं।
मध्य पूर्व संकट पर भारत ने अब तक तटस्थ और संतुलित रुख अपनाया है। विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में क्षेत्र में शांति, स्थिरता और संयम की अपील की है। भारत ने साफ किया है कि वह सभी पक्षों से कूटनीतिक समाधान और बातचीत के जरिये मतभेद सुलझाने की अपेक्षा रखता है।
भारत के सामने चुनौती यह है कि वह अपने दोनों मित्र देशों – ईरान और इजरायल – के साथ अपने हितों की रक्षा करता रहे, जबकि वैश्विक मंच पर शांति और कूटनीति का पक्षधर बना रहे। विशेषज्ञों के अनुसार, भारत का यह संतुलन ही उसकी विदेश नीति की परिपक्वता को दर्शाता है।
ईरान-इजरायल संघर्ष के बीच भारत का स्टैंड वैश्विक राजनीति में उसकी भूमिका को और मजबूत करता है। न तो वह किसी एक पक्ष के साथ खुलकर खड़ा हुआ है, और न ही अपनी रणनीतिक साझेदारियों को दांव पर लगा रहा है। यह रुख न केवल क्षेत्रीय स्थिरता के लिए जरूरी है, बल्कि भारत की वैश्विक छवि को भी मजबूती देता है।