रक्षा बजट बढ़ाने के लिए लेबर सरकार बेचेगी खाली और जर्जर सैन्य ठिकाने

रक्षा बजट बढ़ाने के लिए लेबर सरकार बेचेगी खाली और जर्जर सैन्य ठिकाने

कैनबरा।
ऑस्ट्रेलिया की अल्बानीज़ सरकार ने रक्षा बजट के लिए अतिरिक्त धन जुटाने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए देश के प्रमुख शहरों में स्थित कई पुराने और अनुपयोगी रक्षा परिसरों को बेचने का फैसला किया है। यह निर्णय अमेरिका के बढ़ते दबाव और चीन की सैन्य गतिविधियों को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच लिया गया है।

रक्षा विभाग द्वारा कराए गए एक व्यापक ऑडिट में सामने आया है कि देश भर में मौजूद 68 रक्षा स्थल ऐसे हैं जिनका अब कोई ठोस सैन्य उपयोग नहीं रह गया है, लेकिन इनके रखरखाव पर हर साल करोड़ों डॉलर खर्च हो रहे हैं। यह ऑडिट 2023 की रणनीतिक रक्षा समीक्षा के बाद कराया गया था, जिसमें चेतावनी दी गई थी कि ऑस्ट्रेलिया द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सबसे असुरक्षित दौर से गुजर रहा है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि रक्षा विभाग का बुनियादी ढांचा दशकों पुराने फैसलों और टालमटोल का बोझ ढो रहा है। कई स्थल ऐसे हैं जिनका वर्तमान या भविष्य की सैन्य जरूरतों से कोई सीधा संबंध नहीं है और जिन पर तुरंत निर्णय लेना आवश्यक हो गया है।

सरकार ने 64 रक्षा स्थलों को पूरी तरह बेचने, तीन स्थलों को आंशिक रूप से बेचने और एक स्थल को अपने पास बनाए रखने पर सहमति जताई है। इनमें से कुछ संपत्तियां पहले ही बेची जा चुकी हैं। न्यू साउथ वेल्स, विक्टोरिया और साउथ ऑस्ट्रेलिया में स्थित कई प्रमुख स्थल इस सूची में शामिल हैं।

इन बिक्री से लगभग 3 अरब ऑस्ट्रेलियाई डॉलर जुटने की उम्मीद है, जिसमें से शुद्ध रूप से 1.8 अरब डॉलर सीधे राष्ट्रीय रक्षा बजट में लगाए जाएंगे। कई संपत्तियां विरासत सूची में दर्ज हैं, जिनमें सिडनी और मेलबर्न की ऐतिहासिक विक्टोरिया बैरक्स भी शामिल हैं।

रक्षा मंत्री रिचर्ड मार्ल्स ने कहा कि देश की सुरक्षा के लिए यह सुधार जरूरी है। उन्होंने कहा,
“ऑस्ट्रेलियाई रक्षा बल को प्रभावी ढंग से काम करने के लिए ऐसे सैन्य परिसरों की जरूरत है जो वर्तमान चुनौतियों के अनुरूप हों। कई स्थल वर्षों से खाली, जर्जर और अनुपयोगी पड़े हैं, जिन पर भारी खर्च हो रहा है।”

मार्ल्स ने इस फैसले को “कठिन लेकिन राष्ट्रीय हित में जरूरी सुधार” बताया और कहा कि सरकार इसे पूरी प्रतिबद्धता के साथ लागू करेगी।

गौरतलब है कि अमेरिका ने ऑस्ट्रेलिया से रक्षा खर्च को सकल घरेलू उत्पाद के 3.5 प्रतिशत तक बढ़ाने की मांग की है, जबकि चीन द्वारा किए जा रहे सैन्य विस्तार ने क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर चिंताएं और गहरा दी हैं।