काठमांडू। भारत और चीन के विदेश मंत्रियों के बीच हाल ही में हुए समझौते ने नेपाल की राजनीतिक और कूटनीतिक हलचल को बढ़ा दिया है। इस समझौते में 9वें बिंदु को लेकर काठमांडू सरकार असहज महसूस कर रही है और सूत्रों के मुताबिक नेपाल अब औपचारिक रूप से अपनी आपत्ति दर्ज कराने के लिए भारत और चीन दोनों को डिप्लोमैटिक नोट भेजने की तैयारी कर रहा है।
नेपाल का कहना है कि समझौते में सीमा और भू-भाग से जुड़ा मुद्दा उसकी संप्रभुता और अधिकारों को प्रभावित कर सकता है। नेपाल सरकार का मानना है कि इस समझौते के कुछ पहलू ऐसे हैं जो काठमांडू की सहमति के बिना उसके भौगोलिक हितों को प्रभावित करते हैं। कूटनीतिक हलकों का मानना है कि नेपाल इस कदम के जरिए यह संदेश देना चाहता है कि किसी भी क्षेत्रीय समझौते में उसकी अनदेखी स्वीकार नहीं की जाएगी।
नेपाल के भीतर विपक्षी दल इस समझौते को बड़ा मुद्दा बना रहे हैं। उनका आरोप है कि सरकार भारत और चीन के दबाव में अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता कर रही है। इसी दबाव के चलते प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल 'प्रचंड' की सरकार भी अब सख्त रुख अपनाने को मजबूर हुई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाल की आपत्ति से भारत-चीन समझौते पर प्रत्यक्ष असर तो नहीं पड़ेगा, लेकिन यह जरूर संकेत देगा कि दक्षिण एशिया के क्षेत्रीय समीकरणों को दरकिनार कर किसी भी दो देशों के बीच हुआ समझौता विवाद को जन्म दे सकता है। नेपाल का यह कदम काठमांडू-नई दिल्ली और काठमांडू-बेइजिंग रिश्तों में नई कूटनीतिक खींचतान की शुरुआत भी कर सकता है।
सूत्रों के मुताबिक, नेपाल सरकार आने वाले दिनों में औपचारिक रूप से नोट तैयार कर दोनों देशों के दूतावासों को सौंपेगी। इसके बाद यह देखना होगा कि भारत और चीन इस पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं।
👉 यह मामला केवल भारत-चीन-नेपाल के रिश्तों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय संतुलन और सहयोग की दिशा को भी प्रभावित कर सकता है।