भारत-यूरोपीय संघ एफटीए को नॉर्वे का समर्थन, मुक्त व्यापार को बताया भविष्य की राह

भारत-यूरोपीय संघ एफटीए को नॉर्वे का समर्थन, मुक्त व्यापार को बताया भविष्य की राह

नई दिल्ली।
भारत और यूरोपीय संघ के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) को लेकर वैश्विक स्तर पर समर्थन बढ़ता जा रहा है। इसी क्रम में नॉर्वे ने भी भारत-यूरोपीय संघ एफटीए के पक्ष में अपना मजबूत समर्थन जताया है। नॉर्वे की भारत में राजदूत मे-एलिन स्टेनर ने इसे एक ऐतिहासिक मील का पत्थर बताते हुए कहा कि यह समझौता न केवल भारत और यूरोप के बीच व्यापारिक रिश्तों को नई गति देगा, बल्कि व्यापक यूरोपीय क्षेत्र के साथ भारत के आर्थिक जुड़ाव को भी मजबूत करेगा।

एक विशेष बातचीत में राजदूत स्टेनर ने कहा कि भारत और नॉर्वे के द्विपक्षीय संबंध पहले से ही सकारात्मक और स्थिर दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। नए व्यापार समझौतों और दोनों देशों की बढ़ती व्यावसायिक रुचि से यह साझेदारी और गहरी होगी।

यूरोपीय संघ का हिस्सा नहीं, फिर भी समर्थन

हालांकि नॉर्वे यूरोपीय संघ का सदस्य नहीं है, लेकिन वह यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (ईएफटीए) का हिस्सा है। स्टेनर ने बताया कि नॉर्वे और भारत के बीच व्यापार एवं आर्थिक साझेदारी समझौता (टीईपीए) पहले ही लागू हो चुका है, जिसे उन्होंने द्विपक्षीय संबंधों के लिए एक अहम उपलब्धि बताया।

उन्होंने कहा कि यूरोपीय संघ नॉर्वे का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, ऐसे में भारत-यूरोप के बीच गहराता आर्थिक सहयोग नॉर्वे के लिए भी सकारात्मक प्रभाव लेकर आएगा।

संरक्षणवाद पर जताई चिंता

वैश्विक आर्थिक हालात पर टिप्पणी करते हुए नॉर्वे की राजदूत ने मुक्त व्यापार के पक्ष में स्पष्ट रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि टैरिफ युद्ध और संरक्षणवादी नीतियां वैश्विक अनिश्चितता को और बढ़ाती हैं। एक छोटी और खुली अर्थव्यवस्था होने के नाते नॉर्वे ने हमेशा नियम-आधारित बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली से लाभ उठाया है।

उन्होंने कहा कि व्यापार बाधाओं को बढ़ाने के बजाय उन्हें कम करना ही स्थायी आर्थिक विकास का रास्ता है।

नोबेल शांति पुरस्कार पर नॉर्वे का रुख स्पष्ट

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नोबेल शांति पुरस्कार को लेकर दिए गए बयानों पर प्रतिक्रिया देते हुए राजदूत स्टेनर ने स्पष्ट किया कि नोबेल पुरस्कार के चयन में नॉर्वे सरकार की कोई भूमिका नहीं होती। उन्होंने कहा कि नॉर्वेजियन नोबेल समिति एक स्वतंत्र संस्था है और उसके निर्णय पूरी तरह स्वायत्त होते हैं।

स्टेनर ने जोर दिया कि नोबेल शांति पुरस्कार को एक स्वतंत्र और अंतरराष्ट्रीय सम्मान के रूप में ही बने रहना चाहिए।