बोंडी विधेयक में बड़ा बदलाव: प्रधानमंत्री ने हथियार कानून अलग किए, नस्लीय नफरत से जुड़े प्रावधान हटाए

बोंडी विधेयक में बड़ा बदलाव: प्रधानमंत्री ने हथियार कानून अलग किए, नस्लीय नफरत से जुड़े प्रावधान हटाए

कैनबरा। ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज़ ने बोंडी आतंकी हमले के बाद प्रस्तावित कड़े कानूनों में बड़ा संशोधन करते हुए विवादास्पद बोंडी बिल को विभाजित करने का ऐलान किया है। सरकार अब हथियारों से जुड़े कानूनों को अलग विधेयक के रूप में संसद में लाएगी, जबकि नस्लीय घृणा (रेशियल विलिफिकेशन) से संबंधित प्रावधानों को पूरी तरह वापस ले लिया गया है।

प्रधानमंत्री ने शनिवार को अचानक बुलाई गई प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि यह साफ हो गया है कि यदि हथियार कानूनों को व्यापक (ओम्निबस) बिल से अलग किया जाए तो उन्हें संसद का समर्थन मिल सकता है। उन्होंने कहा, “नस्लीय घृणा से जुड़े प्रावधानों को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त समर्थन नहीं है, इसलिए हम उन पर आगे नहीं बढ़ेंगे।”

ग्रीन्स का समर्थन, लेकिन शर्तों के साथ

ग्रीन्स पार्टी की नेता लारिसा वॉटर्स ने सरकार को हथियार कानूनों पर समर्थन देने की बात कही, लेकिन व्यापक बिल में सभी धार्मिक समुदायों—जिसमें इस्लाम भी शामिल हो—को समान रूप से शामिल करने की मांग रखी। ग्रीन्स का कहना है कि जल्दबाजी में लाए गए नफरत-रोधी कानून वैध राजनीतिक अभिव्यक्ति को अपराध बना सकते हैं।

ग्रीन्स की उपनेता मेहरीन फारूकी ने प्रस्तावित मसौदे को “खतरनाक” बताते हुए कहा कि इसमें इतने गंभीर दोष हैं कि इसे सुधारा नहीं जा सकता।

विपक्ष और गठबंधन का विरोध

विपक्ष की नेता सुसैन ले ने इस विधेयक को “असुधार योग्य” करार दिया। उन्होंने कहा कि इतनी गंभीर प्रकृति के कानूनों के लिए स्पष्टता और भरोसे की जरूरत होती है, जबकि सरकार का प्रस्ताव भ्रम और विरोधाभासों से भरा है।

कोएलिशन ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री ने पहले जिस बिल को “अविभाज्य” बताया था, अब उसी को राजनीतिक दबाव में विभाजित कर दिया गया है। विपक्ष का कहना है कि संसदीय जांच समिति और जनता की हजारों प्रस्तुतियों की अनदेखी की गई है।

सरकार का तर्क

प्रधानमंत्री अल्बनीज़ ने कहा कि संसद में लगातार टकराव की स्थिति नहीं बननी चाहिए और हथियार कानूनों को लेकर स्पष्ट निर्णय जरूरी है। उन्होंने यह भी दावा किया कि प्रस्तावित नफरत-रोधी कानूनों की वजह से नेशनल सोशलिस्ट नेटवर्क जैसे चरमपंथी समूहों पर पहले ही दबाव पड़ा है।

सरकार के अनुसार, बोंडी हमले के बाद सुरक्षा, भाषण, माइग्रेशन और हथियार कानूनों में बदलाव जरूरी थे। अब संशोधित बिल मंगलवार को संसद में पेश किया जाएगा, जबकि सोमवार को दिवंगतों के लिए शोक प्रस्ताव रखा जाएगा।

आगे की राह

सीनेट में विधेयक पारित कराने के लिए सरकार को या तो ग्रीन्स या कोएलिशन का समर्थन चाहिए। जहां ग्रीन्स हथियार कानूनों पर सहमत दिख रहे हैं, वहीं व्यापक नफरत-रोधी कानूनों पर मतभेद बने हुए हैं। आने वाले दिनों में संसद में इस पर तीखी बहस के आसार हैं।