कैनबरा।
लिबरल पार्टी की प्रमुख नेता और सांसद जैसिंटा नाम्पिजिन्पा प्राइस ने भारतीय प्रवासियों पर दिए अपने विवादास्पद बयान से कदम पीछे खींचते हुए कहा है कि उनके शब्दों को “संदर्भ से तोड़-मरोड़कर पेश किया गया”। हालांकि उन्होंने साफ किया कि वे अभी भी अल्बनीज़ सरकार की ‘मास माइग्रेशन एजेंडा’ की मुखर आलोचक बनी रहेंगी।
कुछ दिनों पहले एक कार्यक्रम में प्राइस ने भारतीय प्रवासियों को लेकर टिप्पणी की थी, जिसके बाद राजनीतिक हलकों और भारतीय समुदाय दोनों से तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आईं। आलोचकों ने इसे प्रवासी समुदाय को सीधे निशाना बनाने वाली टिप्पणी बताया।
फंडरेज़र कार्यक्रम में बोलते हुए प्राइस ने कहा—
“मेरा बयान किसी खास समुदाय को आहत करने के लिए नहीं था। मेरे शब्दों को जिस तरह संदर्भ से बाहर लेकर पेश किया गया, उससे गलत संदेश गया। मेरा मकसद केवल लेबर सरकार की प्रवासन नीतियों पर सवाल उठाना था।”
प्राइस ने भारतीय प्रवासियों पर दिए बयान से सफाई देते हुए भी लेबर सरकार की नीतियों को कठघरे में खड़ा किया। उन्होंने कहा कि मौजूदा प्रवासन नीति देश के आवास, स्वास्थ्य सेवाओं और रोजगार पर भारी दबाव डाल रही है।
उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज़ की सरकार देश के दीर्घकालिक हितों की अनदेखी कर केवल राजनीतिक लाभ के लिए बड़े पैमाने पर प्रवासियों को जगह दे रही है।
प्राइस की टिप्पणी से नाराज़ भारतीय मूल के संगठनों ने कहा कि प्रवासी समुदाय ने ऑस्ट्रेलिया की आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
एक सामुदायिक प्रतिनिधि ने कहा—
“राजनीतिक दलों को प्रवासी समुदायों को बलि का बकरा बनाने के बजाय उनके योगदान को स्वीकार करना चाहिए।”
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद ऑस्ट्रेलिया में आगामी चुनावों से पहले प्रवासन नीति को बड़ा चुनावी मुद्दा बना सकता है। लिबरल पार्टी इसे आवास और रोजगार संकट से जोड़कर जनता के बीच ले जाने की कोशिश कर रही है, जबकि लेबर सरकार का दावा है कि प्रवासी समुदाय देश की अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने में अहम भूमिका निभा रहा है।
प्राइस भले ही अब अपने बयान को “संदर्भ से बाहर” बताया हो, लेकिन यह विवाद थमता नजर नहीं आ रहा। प्रवासन नीति और प्रवासी समुदाय की भूमिका को लेकर उठे सवाल आने वाले दिनों में ऑस्ट्रेलियाई राजनीति के केंद्र में रह सकते हैं।