नई दिल्ली।
सऊदी अरब ने स्पष्ट कर दिया है कि वह भारत के खिलाफ किसी भी तरह के सैन्य या रणनीतिक मोर्चेबंदी का हिस्सा नहीं बनेगा। रियाद में हुई भारत-सऊदी अरब सुरक्षा कार्य समूह की बैठक के बाद सामने आए इस रुख को पाकिस्तान के लिए कूटनीतिक झटके के तौर पर देखा जा रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि इससे पाकिस्तान की तथाकथित ‘इस्लामिक नाटो’ जैसी योजनाओं की हवा निकल गई है।
बैठक में आतंकवाद के सभी रूपों, विशेष रूप से सीमा पार आतंकवाद की कड़ी निंदा की गई। दोनों देशों ने आतंकी गतिविधियों के वित्तपोषण पर रोक, इंटरनेट और डिजिटल मंचों के दुरुपयोग को रोकने तथा कट्टरपंथ से निपटने के लिए सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई। सऊदी अरब की ओर से भारत की सुरक्षा चिंताओं को समर्थन दिए जाने को रणनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है।
पिछले वर्ष सितंबर में पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच एक संभावित रणनीतिक रक्षा ढांचे को लेकर चर्चाएं हुई थीं, जिसमें नाटो जैसी सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था की अवधारणा शामिल बताई गई थी। पाकिस्तान की मंशा थी कि ऐसा कोई ढांचा भारत के खिलाफ सुरक्षा कवच का काम करे। हालांकि हालिया बैठक के बाद यह संकेत साफ हो गया है कि सऊदी अरब भारत के साथ अपने रिश्तों को किसी भी स्थिति में जोखिम में नहीं डालेगा।
पाकिस्तान की सऊदी अरब और तुर्किये के साथ मिलकर त्रिपक्षीय रक्षा व्यवस्था बनाने की कोशिशें भी अब ठंडी पड़ती दिख रही हैं। जानकारों के मुताबिक मौजूदा क्षेत्रीय समीकरणों में ऐसी किसी व्यवस्था के आगे बढ़ने की संभावना बेहद कम है। इसे पाकिस्तान की पैन-इस्लामिक कूटनीति की सीमाओं के रूप में देखा जा रहा है।
विदेश मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि सऊदी अरब भारत को एक करीबी और भरोसेमंद साझेदार मानता है। वह ऐसा कोई कदम नहीं उठाएगा जिससे भारत-सऊदी संबंधों को नुकसान पहुंचे। विशेषज्ञों के अनुसार ‘इस्लामिक नाटो’ जैसी अवधारणा व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि नाटो की स्थापना एक विशिष्ट ऐतिहासिक और राजनीतिक संदर्भ में हुई थी। इस्लामी देशों के बीच भारत के खिलाफ किसी साझा खतरे को लेकर भी कोई आम सहमति नहीं है।
कुल मिलाकर, रियाद बैठक ने यह साफ कर दिया है कि क्षेत्रीय सुरक्षा के मसले पर सऊदी अरब भारत के साथ तालमेल को प्राथमिकता देगा, न कि पाकिस्तान की भारत-विरोधी रणनीतियों को।