नई दिल्ली।
देश में निजी स्कूलों की बढ़ती फीस अब मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए एक बड़ा सिरदर्द बन चुकी है। LocalCircles द्वारा हाल ही में कराए गए एक राष्ट्रीय सर्वे में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि आज के समय में बच्चों की स्कूल फीस कई अभिभावकों की मासिक सैलरी के बराबर या उससे भी अधिक हो चुकी है।
यह सर्वे देशभर के लाखों माता-पिता की राय पर आधारित है और इससे पता चलता है कि शिक्षा अब केवल अधिकार नहीं, बल्कि आर्थिक बोझ बनती जा रही है।
LocalCircles के अनुसार:
52% अभिभावकों ने माना कि स्कूल की वार्षिक फीस उनके सालाना वेतन के 25% से अधिक है।
25% ने बताया कि स्कूल फीस उनकी सैलरी का 50% या उससे भी अधिक हो चुकी है।
कई शहरों में अभिभावकों को केवल एक बच्चे की पढ़ाई पर सालाना 1 से 2 लाख रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं।
निजीकरण की दौड़: सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता को लेकर असमंजस होने के कारण माता-पिता बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में भेजने को मजबूर हैं, जिनकी फीस हर साल 10-15% बढ़ाई जा रही है।
इन्फ्रास्ट्रक्चर और फैंसी सुविधाएं: स्मार्ट क्लास, एसी क्लासरूम, स्पोर्ट्स एकेडमी, रोबोटिक्स लैब जैसी सुविधाओं के नाम पर स्कूल फीस में बेतहाशा वृद्धि की जाती है।
छिपे हुए शुल्क: ट्यूशन फीस के अलावा ऐडमिशन चार्ज, डेवेलपमेंट फीस, लैब फीस, ऐक्टिविटी चार्ज जैसे कई अन्य शुल्क अलग से वसूले जाते हैं।
सरकारी नियंत्रण की कमी: कई राज्यों में प्राइवेट स्कूलों पर फीस नियंत्रण के नियम लागू नहीं हैं या फिर वे सिर्फ कागजों तक सीमित हैं।
दिल्ली के रोहिणी निवासी संजय मिश्रा कहते हैं, "मेरी मासिक सैलरी ₹60,000 है, लेकिन बेटे की स्कूल फीस और ट्रांसपोर्ट मिलाकर ₹30,000 से अधिक हो जाती है। बाकी खर्च कैसे चलाएं?"
मुंबई की एक आईटी प्रोफेशनल श्रद्धा कुलकर्णी का कहना है, "फीस तो छोड़िए, किताबें, यूनिफॉर्म, प्रोजेक्ट मैटेरियल और एक्स्ट्रा क्लासेस— सब कुछ महंगा होता जा रहा है।"
कई अभिभावकों को बच्चों की पढ़ाई के लिए लोन लेना पड़ रहा है।
परिवार अपनी अन्य जरूरी जरूरतों में कटौती करने को मजबूर हो रहे हैं।
दो बच्चों वाले कई परिवार अब केवल एक ही बच्चे को प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने का फैसला कर रहे हैं।
फीस नियंत्रण कानून: सरकार को हर राज्य में स्कूल फीस पर नियंत्रण के लिए कड़े कानून लाने की जरूरत है।
सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता सुधारना: अगर सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाई जाए तो निजी स्कूलों पर निर्भरता कम हो सकती है।
फीस ट्रांसपेरेंसी: स्कूलों को फीस स्ट्रक्चर स्पष्ट रूप से अभिभावकों के सामने रखना अनिवार्य किया जाए।
शिक्षा आज केवल किताबों तक सीमित नहीं रही, लेकिन अगर इसकी लागत इतनी बढ़ जाए कि आम आदमी की कमर ही टूट जाए, तो यह देश के भविष्य पर भी सवाल खड़े करता है। जरूरत है कि सरकार, स्कूल प्रबंधन और समाज मिलकर इस गंभीर समस्या का हल ढूंढें, ताकि शिक्षा सभी के लिए सुलभ और सस्ती बन सके।