ऑस्ट्रेलिया में कार्यस्थलों पर यौन उत्पीड़न की भयावह स्थिति को उजागर करते हुए ऑस्ट्रेलियाई मानवाधिकार आयोग (AHRC) की नई रिपोर्ट ‘स्पीकिंग फ्रॉम एक्सपीरियंस’ ने चौंकाने वाले आंकड़े सामने रखे हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, हर तीन में से एक ऑस्ट्रेलियाई कर्मचारी अपने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न का शिकार हुआ है। सर्वे में 300 श्रमिकों से गहन बातचीत की गई, जिनमें से बड़ी संख्या में लोग समाज के कमजोर वर्गों से आते हैं।
47 प्रतिशत पीड़ित 15 से 17 वर्ष के युवा थे।
53 प्रतिशत ने खुद को विकलांगता से ग्रस्त बताया।
44 प्रतिशत LGBTQIA+ समुदाय से थे।
26 प्रतिशत विदेशी नागरिक या वीजा धारक थे।
इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि ऐसे लोग, जो सामाजिक, आर्थिक या कानूनी रूप से कमजोर स्थिति में होते हैं, उन्हें यौन उत्पीड़न का ज्यादा सामना करना पड़ता है।
लिंग भेद के साथ अन्य भेदभाव भी जुड़े
ऑस्ट्रेलिया की सेक्स डिस्क्रिमिनेशन कमिश्नर डॉ. अन्ना कोडी ने कहा, “यह रिपोर्ट एक ऐतिहासिक सुधार परियोजना रही है। यह दिखाती है कि यौन उत्पीड़न केवल लिंग आधारित शक्ति का मामला नहीं है, बल्कि इसमें नस्ल, प्रवासी स्थिति, यौन पहचान, विकलांगता, मूलनिवासी स्थिति और उम्र जैसे कई अन्य भेदभाव भी जुड़े होते हैं।”
उन्होंने यह भी कहा कि “समाधान तभी निकल सकते हैं जब हम पीड़ितों की आवाज़ सुनें और उनकी वास्तविक कहानियों से सीखें।”
सरकार और कंपनियों पर दबाव
यह रिपोर्ट देश में चल रहे उन आंदोलनों और याचिकाओं की पृष्ठभूमि में आई है, जहां हजारों लोग कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अब समय आ गया है कि सरकार और निजी क्षेत्र मिलकर ऐसी नीतियां बनाएं जो पीड़ितों को सुरक्षा और न्याय दिला सकें।