विदेशी सहायता पर संकट: ट्रंप की कटौतियों से ऑस्ट्रेलिया पर दबाव, चीन की नजर

विदेशी सहायता पर संकट: ट्रंप की कटौतियों से ऑस्ट्रेलिया पर दबाव, चीन की नजर

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के व्हाइट हाउस में लौटते ही उनकी विदेश नीति का असर पूरी दुनिया में दिखने लगा है। विशेषकर विदेशी सहायता कार्यक्रमों में अचानक की गई भारी कटौती ने एशिया-प्रशांत क्षेत्र के छोटे देशों को झटका दिया है। इन देशों को अब विकास और मानवीय सहायता के लिए नए विकल्प तलाशने पड़ रहे हैं।

ट्रंप के कदम से हिली अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ

जनवरी के अंतिम सप्ताह में, राष्ट्रपति ट्रंप के शपथ ग्रहण के कुछ ही दिन बाद, अंतरराष्ट्रीय विकास संस्था एफएचआई 360 को अमेरिकी प्रशासन से एक ईमेल मिला। इसमें साफ कहा गया कि विदेशी सहायता योजनाओं के लिए जारी धनराशि में तत्काल कटौती की जाएगी। यह कटौती स्वास्थ्य, शिक्षा, खाद्य सुरक्षा और विकास से जुड़े उन प्रोजेक्ट्स पर भारी पड़ी है, जिनसे एशियाई और प्रशांत द्वीप देशों में लाखों लोग लाभान्वित हो रहे थे।

ऑस्ट्रेलिया पर ‘बैग पकड़ने’ की स्थिति

अमेरिका के पीछे हटने के बाद अब ऑस्ट्रेलिया पर इन देशों की जरूरतों को पूरा करने का दबाव बढ़ गया है। विश्लेषकों का कहना है कि ऑस्ट्रेलिया अचानक ऐसी स्थिति में आ गया है, जैसे कोई यात्री यात्रा के बीच में अपना सामान किसी और के कंधे पर डाल दे और चला जाए।
ऑस्ट्रेलिया की आर्थिक क्षमता सीमित है, फिर भी उसे क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने के लिए अतिरिक्त धन और संसाधन खर्च करने पड़ रहे हैं। यह उसके घरेलू बजट और कूटनीतिक नीति दोनों के लिए कठिन चुनौती है।

चीन का बढ़ता प्रभाव

इसी बीच चीन इस नए हालात को अपने लिए अवसर के रूप में देख रहा है। लंबे समय से चीन, एशिया-प्रशांत के छोटे देशों में बुनियादी ढाँचे और ऋण आधारित परियोजनाओं के जरिए अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है।
अमेरिकी कटौती से जो शून्य बना है, उसे भरने के लिए बीजिंग तेजी से आगे बढ़ सकता है। इससे न केवल क्षेत्रीय राजनीति का संतुलन बदल सकता है, बल्कि सुरक्षा समीकरण भी पूरी तरह प्रभावित होंगे।

रणनीतिक चुनौती और भविष्य

कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका दोनों के लिए चेतावनी है। अगर दोनों देश मिलकर कोई नई संयुक्त रणनीति नहीं बनाते, तो आने वाले वर्षों में एशिया-प्रशांत में चीन का प्रभाव और बढ़ेगा।
ऑस्ट्रेलिया के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अपने सीमित संसाधनों से कितनी दूर तक इन देशों की मदद कर पाएगा। वहीं, अमेरिका की यह नीति उसके पारंपरिक सहयोगियों को असमंजस में डाल रही है।