डोनाल्ड ट्रंप के ‘ईरान के परमाणु कार्यक्रम को नेस्तनाबूद’ करने के दावे पर अमेरिकी सैन्य खुफिया एजेंसी ने पानी फेर दिया है। अमेरिकी रक्षा खुफिया एजेंसी (DIA) की प्रारंभिक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका द्वारा शनिवार को किए गए हवाई हमलों के बावजूद ईरान की अधिकांश परमाणु सुविधाएं सुरक्षित बनी हुई हैं और उसका परमाणु कार्यक्रम केवल कुछ महीनों के लिए बाधित हुआ है।
यह रिपोर्ट ट्रंप प्रशासन के दावे से बिल्कुल उलट है, जिसमें कहा गया था कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम ‘पूरी तरह से नष्ट’ कर दिया गया है।
ऑपरेशन 'मिडनाइट हैमर' की सच्चाई
ट्रंप के आदेश पर शुरू किए गए ऑपरेशन 'मिडनाइट हैमर' के तहत ईरान के तीन प्रमुख परमाणु केंद्रों – फोर्डो, इस्फहान और नतांज – को GBU-57 "बंकर बस्टर" बमों से निशाना बनाया गया था। इन केंद्रों को भूमिगत बनाए जाने के कारण उन्हें नष्ट करना बेहद कठिन माना जाता है।
DIA की रिपोर्ट के अनुसार, हमले में केवल दो केंद्रों के प्रवेश द्वार ढहाए जा सके, लेकिन भूमिगत संरचनाएं ज्यादातर सुरक्षित रहीं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ईरान ने अपने समृद्ध यूरेनियम का अधिकांश भंडार पहले ही अन्य जगहों पर स्थानांतरित कर दिया था, जिससे वह अमेरिका के हमले से बच गया।
सेंट्रीफ्यूज अभी भी चालू, समृद्ध यूरेनियम सुरक्षित
खुफिया रिपोर्ट के अनुसार, ईरान की अधिकतर सेंट्रीफ्यूज मशीनें अभी भी काम कर रही हैं, और समृद्ध यूरेनियम का भंडार लगभग पूरी तरह सुरक्षित है। यह निष्कर्ष CNN और न्यूयॉर्क टाइम्स सहित कई अमेरिकी मीडिया संस्थानों ने अज्ञात स्रोतों के हवाले से प्रकाशित किया है।
एक वरिष्ठ अधिकारी ने CNN को बताया, “यह हमला ईरान के कार्यक्रम को मुश्किल से कुछ महीनों के लिए ही पीछे धकेल सका है।”
व्हाइट हाउस की प्रतिक्रिया
व्हाइट हाउस ने DIA की रिपोर्ट को “पूरी तरह गलत” बताते हुए इसका खंडन किया है और रिपोर्ट लीक करने वालों की निंदा की है। हालांकि प्रशासन ने रिपोर्ट के अस्तित्व या उसकी प्रमुख बातों को सीधे नकारा नहीं है।
इस बीच, राष्ट्रपति ट्रंप ने NATO समिट के लिए रवाना होने से पहले मीडिया के सामने अप्रत्याशित रूप से गुस्सा जाहिर किया और एक लाइव टेलीविज़न इंटरव्यू में F-word का इस्तेमाल कर दिया, जिससे माहौल और गर्म हो गया।
निष्कर्ष
इस रिपोर्ट ने अमेरिका की ईरान नीति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि ट्रंप प्रशासन के दावे गलत साबित होते हैं, तो यह न केवल अमेरिकी खुफिया प्रतिष्ठानों के साथ टकराव को बढ़ा सकता है बल्कि आने वाले चुनावों में ट्रंप की विश्वसनीयता पर भी असर डाल सकता है।