वैश्विक सप्लाई चेन में बढ़ती अनिश्चितताओं और चीन पर निर्भरता कम करने की कोशिशों के बीच भारत को एक अहम कूटनीतिक संकेत मिला है। अमेरिका ने भारत को ग्रुप ऑफ सेवन (G7) देशों के वित्त मंत्रियों की एक विशेष बैठक में आमंत्रित किया है, जो सोमवार को वॉशिंगटन में होने जा रही है। इस बैठक में क्रिटिकल मिनरल्स यानी दुर्लभ और रणनीतिक खनिजों की आपूर्ति, सुरक्षा और भविष्य की रणनीति पर विस्तार से चर्चा होगी।
यह न्योता ऐसे समय आया है, जब भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील को लेकर सख्त बातचीत चल रही है और ऊंचे टैरिफ की आशंकाएं भी बनी हुई हैं। ऐसे में भारत को दिया गया यह आमंत्रण सिर्फ एक औपचारिक बैठक तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे बदलती वैश्विक आर्थिक और रणनीतिक प्राथमिकताओं से जोड़कर देखा जा रहा है।
अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के अनुसार, वह पिछले साल G7 नेताओं की बैठक के बाद से ही क्रिटिकल मिनरल्स पर केंद्रित चर्चा के पक्ष में रहे हैं। दिसंबर में इस विषय पर एक वर्चुअल बैठक हो चुकी है, लेकिन वॉशिंगटन में होने वाली यह बैठक कहीं अधिक महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इसका उद्देश्य सप्लाई चेन से जुड़े जोखिमों के बीच देशों के बीच समन्वय को मजबूत करना है।
हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि भारत ने इस बैठक में अपनी भागीदारी की औपचारिक पुष्टि की है या नहीं। G7 देशों के अलावा ऑस्ट्रेलिया और कुछ अन्य गैर-G7 देशों के भी इस बैठक में शामिल होने की संभावना है।
चीन पर निर्भरता बनी बड़ी चिंता
क्रिटिकल मिनरल्स को लेकर पश्चिमी देशों की चिंता का सबसे बड़ा कारण चीन पर भारी निर्भरता है। रेयर अर्थ एलिमेंट्स, लिथियम, कोबाल्ट, ग्रेफाइट और कॉपर जैसे खनिज रक्षा तकनीक, सेमीकंडक्टर, रिन्यूएबल एनर्जी उपकरण और इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरियों के लिए बेहद जरूरी हैं। आकलनों के मुताबिक, इन खनिजों की वैश्विक रिफाइनिंग क्षमता का बड़ा हिस्सा चीन के नियंत्रण में है।
बीते कुछ वर्षों में चीन द्वारा इन खनिजों के निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंधों ने पश्चिमी देशों की चिंता बढ़ा दी है। हाल के महीनों में जापानी कंपनियों और कुछ ड्यूल-यूज उत्पादों पर लगी पाबंदियों ने इस मुद्दे को और गंभीर बना दिया है। ऐसे में वॉशिंगटन की यह बैठक रणनीतिक रूप से बेहद अहम मानी जा रही है।
ऑस्ट्रेलिया की भूमिका भी अहम
इस पूरी रणनीति में ऑस्ट्रेलिया की भूमिका भी केंद्र में है। ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के बीच हाल ही में हुए समझौते के तहत अरबों डॉलर की क्रिटिकल मिनरल्स परियोजनाओं और एक प्रस्तावित रणनीतिक रिजर्व पर काम किया जा रहा है। इसका मकसद वैश्विक बाजार में आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में जरूरी खनिजों की उपलब्धता सुनिश्चित करना है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह न्योता
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को मिला यह आमंत्रण उसकी बढ़ती वैश्विक भूमिका और रणनीतिक महत्व को दर्शाता है। भारत अपनी स्वच्छ ऊर्जा नीति और मैन्युफैक्चरिंग लक्ष्यों को हासिल करने के लिए क्रिटिकल मिनरल्स की सुरक्षित और दीर्घकालिक आपूर्ति चाहता है। इसी कारण सरकार ने लिथियम, कोबाल्ट, निकेल और रेयर अर्थ एलिमेंट्स को रणनीतिक संसाधन घोषित किया है और विदेशों में खनिज संपत्तियों के अधिग्रहण से लेकर घरेलू खोज तक पर जोर बढ़ाया है।
G7 और उसके साझेदार देशों के साथ सहयोग से भारत को तकनीक, निवेश और भरोसेमंद सप्लाई पार्टनरशिप तक बेहतर पहुंच मिल सकती है। इससे भारत न केवल अपनी जरूरतें पूरी कर सकेगा, बल्कि खुद को वैश्विक क्रिटिकल मिनरल सप्लाई चेन में एक मजबूत और भरोसेमंद विकल्प के रूप में भी स्थापित कर सकता है।